शीतला सप्तमी/अष्टमी पर शीतला माता की पूजा और बासोड़ा

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शीतला सप्तमी/अष्टमी की पूजा होली के पश्चात आने वाले वाले प्रथम सोमवार अथवा गुरुवार के दिन की जाती है। शीतला माता जी की पूजा बहुत ही विधि विधान के साथ कि जाती है, शुद्धता का पूर्ण ध्यान रखा जाता है। इस विशिष्ट उपासना में शीतला सप्तमी/अष्टमी के एक दिन पूर्व देवी को भोग लगाने के लिए बासी खाने का भोग ‘बसौड़ा’ उपयोग में लाया जाता है। सप्तमी/अष्टमी के दिन बासी वस्तुओं का नैवेद्य शीतला माता को अर्पित किया जाता है।

इस दिन व्रत-उपवास किया जाता है तथा माता की कथा का श्रवण होता है।  कथा समाप्त होने पर मां की पूजा अर्चना होती है तथा शीतलाष्टक को पढा़ जाता है, शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा को दर्शाता है, साथ ही साथ शीतला माता की वंदना उपरांत उनके मंत्र का उच्चारण किया जाता है जो बहुत अधिक प्रभावशाली मंत्र है।

वन्देऽहंशीतलांदेवीं रासभस्थांदिगम्बराम्।। मार्जनीकलशोपेतां सूर्पालंकृतमस्तकाम्।।

पूजा को विधि विधान के साथ पूर्ण करने पर सभी भक्तों के बीच मां के प्रसाद बसौडा़ को बांटा जाता है।  इस प्रकार पूजन समाप्त होने पर भक्त माता से सुख शांती की कामना करता है. संपूर्ण उत्तर भारत में शीतलाष्टमी त्यौहार, बसौड़ा के नाम से भी विख्यात है। मान्यता है कि इस दिन के बाद से बासी भोजन खाना बंद कर दिया जाता है। मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से देवी प्रसन्‍न होती हैं और व्रती के कुल में समस्त शीतलाजनित दोष दूर हो जाते हैं, दाहज्वर, पीतज्वर, चेचक, दुर्गन्धयुक्त फोडे, नेत्र विकार आदी रोग दूर होते हैं। शीतला अष्टमी की व्रत कथा के अनुसार एक साहूकार था जिसके सात पुत्र थे। साहूकार ने समय के अनुसार सातों पुत्रों की शादी कर दी परंतु कई वर्ष बीत जाने के बाद भी सातो पुत्रों में से किसी के घर संतान का जन्म नहीं हुआ। पुत्र वधूओं की सूनी गोद को देखकर साहूकार की पत्नी बहुत दु:खी रहती थी। एक दिन एक वृद्ध स्त्री साहूकार के घर से गुजर रही थी और साहूकार की पत्नी को दु:खी देखकर उसने दु:ख का कारण पूछा। साहूकार की पत्नी ने उस वृद्ध स्त्री को अपने मन की बात बताई। इस पर उस वृद्ध स्त्री ने कहा कि आप अपने सातों पुत्र वधूओं के साथ मिलकर शीतला माता का व्रत और पूजन कीजिए, इससे माता शीतला प्रसन्न हो जाएंगी और आपकी सातों पुत्र वधूओं की गोद हरी हो जाएगी। साहूकार की पत्नी तब माघ मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि (मघा शुक्ला शास्ति तिथि) को अपनी सातों बहूओं के साथ मिलकर उस वृद्धा के बताये विधान के अनुसार माता शीतला का व्रत किया। माता शीतला की कृपा से सातों बहूएं गर्भवती हुई और समय आने पर सभी के सुन्दर पुत्र हुए। समय का चक्र चलता रहा और माघ शुक्ल षष्ठी तिथि आई लेकिन किसी को माता शीतला के व्रत का ध्यान नहीं आया। इस दिन सास और बहूओं ने गर्म पानी से स्नान किया और गरमा गरम भोजन किया। माता शीतला इससे कुपित हो गईं और साहूकार की पत्नी के स्वप्न में आकर बोलीं कि तुमने मेरे व्रत का पालन नहीं किया है इसलिए तुम्हारे पति का स्वर्गवास हो गया है। स्वप्न देखकर साहूकार की पत्नी पागल हो गयी और भटकते भटकते घने वन में चली गईं। वन में साहूकार की पत्नी ने देखा कि जिस वृद्धा ने उसे शीतला माता का व्रत करने के लिए कहा था वह अग्नि में जल रही है। उसे देखकर साहूकार की पत्नी चंक पड़ी और उसे एहसास हो गया कि यह शीतला माता है। अपनी भूल के लिए वह माता से विनती करने लगी, माता ने तब उसे कहा कि तुम मेरे शरीर पर दही का लेपन करो इससे तुम्हारे पर जो दैविक ताप है वह समाप्त हो जाएगा। साहूकार की पत्नी ने तब शीतला माता के शरीर पर दही का लेपन किया इससे उसका पागलपन ठीक हो गया व साहूकार के प्राण भी लौट आये।

शीतला सप्तमी/अष्टमी पर शीतला माता की पूजा और बासोड़ा से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी:-

# शीतला सप्तमी के एक दिन पहले मीठा भात (ओलिया ), खाजा, चूरमा, मगद, नमक पारे, शक्कर पारे, बेसन चक्की, पुए, पकौड़ी, राबड़ी, बाजरे की रोटी, पूड़ी सब्जी  आदि बना लें। कुल्हड़ में मोठ, बाजरा भिगो दें। इनमे से कुछ भी पूजा से पहले नहीं खाना चाहिए। माता जी की पूजा के लिए ऐसी रोटी बनानी चाहिए जिनमे लाल रंग के सिकाई के निशान नहीं हों।

# इसी दिन यानि सप्तमी के एक दिन पहले छठ को रात को सारा भोजन बनाने के बाद रसोईघर की साफ सफाई करके पूजा करें। रोली, मौली, पुष्प, वस्त्र आदि अर्पित कर पूजा करें। इस पूजा के बाद चूल्हा नहीं जलाया जाता।

# शीतला सप्तमी के एक दिन पहले नौ कंडवारे, एक कुल्हड़ और एक दीपक कुम्हार के यहाँ से मंगवा लेने चाहिए।

# बासोड़े के दिन सुबह जल्दी उठकर ठंडे पानी से नहायें।

# एक थाली में कंडवारे भरें। कंडवारे में थोड़ा दही, राबड़ी, चावल(ओलिया), पुआ, पकौड़ी, नमक पारे, रोटी, शक्कर पारे, भीगा मोठ, बाजरा आदि जो भी बनाया हो रखें।

# एक अन्य थाली में रोली, चावल, मेहंदी, काजल, हल्दी, लच्छा(मोली), वस्त्र, होली की रखी हुई बड़कुले की एक माला, सिक्का और जल कलश रखें।

# पानी से बिना नमक के आटा गूंथकर इस आटे से एक छोटा दीपक बना लें। इस दीपक में रुई की बत्ती घी में डुबोकर लगा लें ।

# यह दीपक बिना जलाये ही माता जी को चढ़ाया जाता है। # पूजा के लिए साफ सुथरे और सुंदर वस्त्र पहनने चाहिए।

# पूजा की थाली पर, कंडवारों पर तथा घर के सभी सदस्यों को रोली, हल्दी से टीका करें। खुद के भी टीका कर लें।

# हाथ जोड़ कर माता से प्रार्थना करें – हे माता, मान लेना और शीली ठंडी रहना।

# इसके बाद मन्दिर में जाकर पूजा करें। यदि शीतला माता घर पर हो तो घर पर पूजा कर सकते हैं ।

# सबसे पहले माता जी को जल से स्नान कराएँ। # रोली और हल्दी से टीका करें। # काजल, मेहंदी, लच्छा, वस्त्र अर्पित करें । # तीन कंडवारे का सामान अर्पित करें। बड़ी माता , बोदरी और अचपडे ( खसरा ) के लिए। # बड़कुले की माला अर्पित करें। # आटे का दीपक बिना जलाये अर्पित करें। # आरती या गीत आदि गा कर माँ की अर्चना करें। # हाथ जोड़ कर आशीर्वाद लें।

# अंत में वापस जल चढ़ाए , और चढ़ाने के बाद जो जल बहता है, उसमें से थोड़ा जल लोटे में डाल लें। यह जल पवित्र होता है। इसे घर के सभी सदस्य आँखों पर लगाएँ। थोड़ा जल घर के हर हिस्से में छिड़कना चाहिए। इससे घर की शुद्धि होती है पॉजिटिव एनर्जी आती है।

# शीतलामाता की पूजा के बाद पथवारी की पूजा करनी चाहिए। एक कुंडवारे का सामान यहाँ अर्पित करें।

# शीतला माता की कहानी , पथवारी की कहानी और गणेश जी की कहानी सुने।

# इसके बाद जहाँ होली का दहन हुआ था वहाँ आकर पूजा करें थोड़ा जल चढ़ावे , पुआ , पकौड़ी , बाजरा व एक कुंडवारे का सामान चढ़ाए।

# घर आने के बाद परिंडे पर मटकी की पूजा करें। # बचे हुए कंडवारे का सामान कुम्हारी को या गाय को और ब्राह्मणी को दें। # इस प्रकार शीतला माता की पूजा संपन्न होती है। # ठन्डे व्यंजन सपरिवार मिलजुल कर खाएँ और बासोड़ा त्यौहार का आनंद उठाएँ। सोर्स: दादीमाँकेनुस्खे इमेज सोर्स: हिन्दूगॉडवॉलपेपर

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